Monday, November 22, 2010

जीव हत्या और मांसाहार satish chand gupta

‘सत्यार्थ प्रकाश’ में स्वामी जी ने न केवल मांसाहार का निशेध किया है बल्कि यह भी कहा है कि मांसाहारी मनष्‍यों  का संग करने व उनके हाथ का खाने से आर्यों को भी मांस खाने का पाप लगता है। यह भी लिखा है कि पशुओं को मारने वालों को सब मनुष्‍यों  की हत्या करने वाला जानिए। (10-25) एक आर्य समाज के विद्वान से कुछ खास विषयों पर चर्चा हुई, उन्होंने कहा कि मैं तुम्हारी अन्य सारी बातें मानने को तैयार हूँ मगर जीव हत्या कर मांस खाने को मैं धर्मशास्त्र व मानव प्रकृति के अनुकूल नहीं मानता। निरीह, मूक पशु-पक्षियों को काट कर खाना न केवल निंदित व निषिद्ध है, बल्कि जघन्य अपराध भी है।
उन्होंने यहां तक भी कहा कि जो कौमे पशुओं को ज़िब्ह करती हैं, वो कट्टर, बेदर्द और बेरहम हो जाती हैं और उन कौमों को फिर मनुष्‍यों को मारने व काटने में कोई दया व हिचक महसूस नहीं होती। मैंने उनसे पूछा कि जो लोग भ्रूण हत्या कर रहे हैं, अपनी ही निरीह, मूक व निपराध संतान की पेट में ही टुकड़े-टुकड़े कराकर निर्दयता के साथ हत्या करा रहे हैं क्या उनकी यह कट्टरता पशुओं को ज़िब्ह करने व मांस खाने का परिणाम हैं ? क्या इससे अधिक कट्टरता व बेरहमी कोई और हो सकती है ? क्या यह मनुष्‍्य की बेदर्दी की पराकाष्‍ठा नहीं है ?

मैंने उनसे पूछा कि आप बताइए “शेर मांस क्यों खाता है ? उन्होंने कहा कि जानवरों में बुद्धि नहीं होती, उनको अच्छे-बुरे का ज्ञान नहीं होता। अगर मनुष्‍य भी ऐसा ही करता है तो फिर उसमें व जानवरों में अंतर ही क्या रहा ? मैंने उनसे कहा कि हाथी मांस नहीं खाता तो क्या वह बुद्धिमान होता है ? उन्होंने दोबारा अपनी बात बड़ी करते हुए कहा कि मांस तामसी भोजन है, इसको खाने से बुद्धि भी तामसी हो जाती है, ‘‘जैसा खाये अन्न वैसा हो जाए मन’’ मांस मानव बुद्धि व शरीर दोनों के लिए हानिकारक है।
मैंने उनसे कहा कि वैज्ञानिकों का बौद्धिक स्तर सबसे ऊंचा होता है, शायद ही विश्‍व में कोई वैज्ञानिक ऐसा हो जो मांस न खाता हो। क्या उनकी बुद्धि को तामसी कहा जा सकता है ? बाद में उन्होंने इस विषय को पूर्वकृत कर्मों के परिणामों से जोड़कर चर्चा समाप्त कर दी। एक अन्य आर्य समाज के विद्वान ने ‘‘आतंकवाद, समस्या व समाधान’’ विषय पर बोलते हुए कहा कि आतंकवाद का प्रमुख कारण मांसाहार है। तामसी भोजन खाने से बुद्धि तामसी हो जाती है फिर मनुष्‍य को आतंक ही सूझता है। अगर विश्‍व में मांसाहार पर पाबंदी लगा दी जाए तो आतंकवाद की समस्या का समाधान हो सकता है। उनका इशारा तो एक विशेष क़ौम की तरफ़ था, मगर मांस तो विश्‍व  की सभी क़ौमे खाती हैं। 
वनस्पति वैज्ञानिक अनेक शोधों द्वारा इस अंतिम निश्‍कर्ष पर पहुंच गए हैं कि पेड़-पौधों में भी जीवन होता है। स्वामी दयानंद सरस्वती ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में लिखा है कि मनुष्‍य, पशु व पेड़-पौधों आदि में जीव एक जैसा है जो कर्मानुसार एक योनि से दूसरी योनि में आता जाता रहता है। (9-75) इसलिए न तो केवल पशु-पक्षियों आदि को खाना महा पाप हुआ बल्कि पेड़-पौधों को खाना भी जघन्य अपराध हुआ।

पशु-पक्षियों को अगर ज़िब्ह किया जाए तो वे अपना विरोध प्रकट कर सकते हैं, मगर पैड़-पौधों से अधिक लाचार व बेबस और कौन होगा जो अपना विरोध तक प्रकट नहीं कर सकते ? उनको काटना व खाना तो और भी अधिक पाप होगा। तो क्या शाक सब्जियों व फलों आदि को भी नहीं खाना चाहिए। अब अगर हम विज्ञान के सत्य को झुठला भी दें कि पेड़- पौधों में जीवन नहीं है तो क्या हम यह भी झुठला सकते हैं कि जिन शाक-सब्जियों व फलों को हम खाते हैं उनको उत्पन्न करने में कितनी बड़ी संख्या में जीवों की हत्या होती है ?

एक आम के पेड़ पर लगने वाला कड़ी कीड़ा लाखों-करोड़ों की तादाद में होता है। ईख व ज्वार की फ़सल पर लगने वाला पाइरिल्ला एक हेक्टेयर खेत में अरबों-खरबों की तादाद में होता है। चने आदि की फ़सल को लगने वाली सूंडियां व गिडारें कुछ ही दिनों में पूरी फ़सल नष्‍ट कर देती हैं। असंख्य जीवों की हत्या कर किसान गोभी, बैगन, शाक-सब्ज़ी उत्पन्न करता है। अनेक बीमारियों से बचने के लिए हम कीटनाशकक दवाएं प्रयोग करते हैं। घरों में महिलाएं मक्खी, मच्छर, जूं व रसोई घर में रखे दाल, चावल, गेहूं आदि में पैदा होने वाले कीड़ों को मारने में कोई झिझक अथवा ग्लानि महसूस नहीं करती। क्या इन सब जीवों को मारना जीव हत्या के दायरे में नहीं आता ? क्या इन सबसे बचा जा सकता है ? क्या भैंस, गाय, बकरी आदि को मारने ही को जीव हत्या कहते हैं?

यह भी विचारणीय है कि हिंदू संगठन केवल गो-हत्या का विरोध करते हैं, जबकि ऊंट, भैंस, बकरा, मछली आदि भी गाय जैसे ही जीव हैं। यह भी विचारणीय है कि एक तरफ़ तो जीव को आदि अमर व अजर बतलाते हैं दूसरी तरफ जीव हत्या की बात करते हैं। यह भी विचारणीय है कि एक तरफ़ तो कर्मानुसार फल भोग की बात करते हैं दूसरी तरफ जीव हत्या को पाप व जघन्य अपराध की संज्ञा देते हैं। अफ़सोस इस बात का है कि धर्मशास्त्र व विज्ञान दोनों की अनुमति के बावजूद भी इस विषय को विवाद का विषय बनाया गया व बनाया जा रहा है और कुछ मांस खाने वाले हिंदू भाई भी रुग्ण मानसिकता का शिकार होकर मांसाहार का विरोध कर रहे हैं।

हमारे एक साथी जो मांसाहार का पुरजोर विरोध करते हैं, बारह ज्योति-लिंगों के दर्शन हेतु भारत भ्रमण पर निकले। वापसी होने पर यात्रा के सभी पहलुओं पर विस्तार से चर्चा हुई। चर्चा के दौरान उन्होंने बताया कि दक्षिण भारत के लोग उत्तरी भारत की अपेक्षा अधिक धार्मिक प्रवृत्ति के हैं। मैंने उनसे पूछा कि दक्षिण भारत के लोग मांसाहारी होते हैं और आपके अनुसार मांस खाना पाप व अधार्मिक कृत्य है तो फिर वे लोग धार्मिक कहाँ, पापी हैं। उन्होंने अपनी बात बड़ी करते हुए कहा कि दक्षिणी भारत की भौगोलिक परिस्थितियां ही कुछ ऐसी हैं कि वहां मांस खाने को पाप नहीं कहा जा सकता। ये विचार किसी आम व्यक्ति के नहीं बल्कि वर्ग विशेष में अपनी एक खास पहचान रखने वाले व्यक्ति के हैं।

अनेक बीमारियों की दवाएं ऐसी हैं जिनको अनेक पशु-पक्षियों के अंशों  से बनाया जाता है। कुछ खास बीमारियां जैसे - सांस, क्षयरोग आदि में चिकित्सक बकरा, मछली व पक्षियों आदि का मांस खाने की सलाह देते हैं। किसानों की अत्याधिक मांग पर उत्तर प्रदेश सरकार ने नील गाय को नील घोड़ा नाम देकर मारने के शसनादेश जारी किए हैं, ताकि वे किसानों की खड़ी व पकी फ़सल को बरबाद न करें। चूहों से फसल को बचाने के लिए सरकार गीदड़ों की व्यवस्था करती है। भारत के कई राज्यों जैसे तमिलनाडु, पश्चिमी बंगाल व उत्तराखण्ड आदि में गैर-मुस्लिम समाज में बलि की प्रथा प्रचलित है जो बड़ी निर्दयता व निर्भयता से की जाती है। नेपाल में वीरगंज के समीप गढ़ी माई मंदिर में हर वर्ष  करीब 200000 (दो लाख) पशुओं की बलि दी जाती है। नाहन (सिरमौर) गिरिपार में माघी के दिन हर वर्ष हजारों बकरों की बलि दी जाती है। झारखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री मधुकोडा की पत्नी गीता कोडा ने रांची के रजप्पा मंदिर में 11 बकरों की बलि दी (अमर उजाला, 7.11.2009)।

यह भी विचारणीय है कि जो पशु-पक्षी खाने में इस्तेमाल किए जाते हैं उनकी संख्या में कोई कमी नहीं देखी जा रही है। संख्या के एतबार से देखा जाए तो मछली विश्‍व  में सबसे अधिक खाई जाती है मगर मछली का उत्पादन बढ़ता ही जा रहा है। कुछ जीव जैसे शेर, हाथी आदि खाने में इस्तेमाल नहीं होते, उनकी संख्या दिन-प्रतिदिन घटती जा रही है। यह भी विचारणीय है कि विश्‍व  में बहुत से देश ऐसे हैं जो केवल पूरी तरह मांसाहार पर ही निर्भर हैं। ग्रीन लैंड और उत्तरी अमेरिका में समुद्र तटों पर बसने वाली जाति स्कीमों की रोटी, कपड़ा और मकान आदि मानव जीवन की मूलभूत आवश्‍यकताओं की पूर्ति समुद्री जीवों द्वारा ही होती है। उनका जीवन पूर्णतः मांस पर ही निर्भर है।
यह भी विचारणीय है कि नन्हीं-सी चींटीं व मकड़ी मांसाहारी होती है, जबकि विशालकाय हाथी व ऊँट मांसाहारी नहीं होते। बहुत से मध्यम ऊँचाई के पेड़-पौधे मांसाहारी होते हैं, जबकि विशालकाय वट व पीपल वृक्ष मांसाहारी नहीं होते। बगुले को केला व सेब और छिपकली को हम दाल व चावल खाना नहीं खिला सकते। अगर हमें विश्‍वास है कि कोई सृष्टिकर्ता है तो यह उसी की व्यवस्था है। पृथ्वी पर कोई भी जीव अथवा पौधा मनुष्‍य  जाति का मोहताज नहीं है। पीपल, तुलसी, चींटी, बंदर व गाय आदि मनुष्‍य  की वजह से जीवित नहीं हैं, मगर मनुष्‍य इन सबके बिना जीवित नहीं रह सकता। सभी जीव-जन्तु व पेड़-पौधे मनुष्‍य जाति की आवश्‍यकता है। वास्तविकता भी यह है कि सृष्टिकर्ता ने इन सबको पैदा ही मनुष्‍य जाति के उपयोग के लिए किया है।

स्वामी जी ने मांसाहारी मनुष्‍यों  को इतना अधिक मलेच्छ, अछूत, घृणित व पापी माना है कि उनके संग करने मात्र से आर्यों को भी मांस खाने का पाप लगने की सम्भावना व शंका व्यक्त की है, तो क्या मांसाहारी मनुष्‍यों  का संग करने से बचा जा सकता है ? दूसरी बात बिना जीव हत्या के गेहूं, शाक-सब्जी व फल आदि को पैदा नहीं किया जा सकता, अगर हम कीटनाशक दवाओं का इस्तेमाल न भी करें फिर भी खेत जोतने-खोदने में ही असंख्य जीवों की हत्या होती है, तो क्या बिना गेहूं, शाक-सब्जी व फल आदि खाये बिना मनुष्‍य जिन्दा रह सकता है ? क्या ये आदर्श व सिद्धान्त तार्किक व व्यावहारिक हैं?

स्वामी जी ने मनुष्‍य, पशु व पेड़-पौधों में जीव एक जैसा बताया है, फिर तो स्वामी जी के मतानुसार पेड़-पौधों को न केवल खाना बल्कि काटना भी पाप व अपराध हुआ, क्योंकि जिन पेड़-पौधों को हम काट रहे हैं, हो सकता है उनमें हमारे ही किसी सगे-संबंधियों की आत्मा विद्यमान हो।

स्वामी जी की दोनों बातें वेद विरूद्ध तो है हीं, अव्यावहारिक व अतार्किक भी हैं। मांस खाना धर्म शास्त्र व चिकित्सा विज्ञान दोनों की दष्टि से मानव के लिए लाभकारी भी है और मानव की प्रकृति के अनुकूल भी। यह अलग विषय है कि किस पशु-पक्षी का मांस खाया जाए और किसका न खाया जाए तथा किस विधि से काटा जाए। दूसरी बात मानव, पशु व पेड़- पौधों में जीव भी एक जैसा नहीं है, मानव की जीवात्मा कर्म करने में स्वतंत्र व ईश्‍वर के प्रति जवाबदेह है, जबकि पशु व पेड़-पौधे आदि स्वभाव से बंधे हैं, न उन्हें अच्छे-बुरे का ज्ञान है और न ही किसी प्रकार की कोई स्वतंत्रता।

शाकाहार का प्रोपगैंडा satish chand gupta

अक्सर देखा गया है कि भारतीय संस्कृति के जितने भी विद्वान, चिंतक और सुधारक हुए हैं, उन सभी ने मांसाहार का प्रबल विरोध और कठोर “शब्दों में निंदा की है। उनमें चाहे स्वामी दयानंद सरस्वती हो, स्वामी विवेकानंद हो, श्रीराम  शर्मा आचार्य हो, आशाराम बापू हो, श्री रविशंकर हो या योग गुरु रामदेव हो। विडंबना देखिए कि मांसाहार का न वेद निषेध  करते हैं न मनुस्मृति। न रामायण, महाभारत और चरक संहिता में मांसाहार का निषेध है।

न हमारा संविधान मांसाहार का निषेध  करता है और न ही हमारा विज्ञान मांसाहार का विरोध करता है फिर हमारे गुरु, विद्वान और सुधारक मांसाहार का प्रबल विरोध आख़िर क्यों करते हैं ?
माह अक्टूबर 2009 की मासिक पत्रिका ‘अखंड ज्योति’ के एक विषय ‘शाकाहार ही है प्राकृतिक आहार’ में डाइट एंड फूड नामक कृति के लेखक वैज्ञानिक मनीशी डॉक्टर हेग के शब्दों को लिखा गया है -
‘‘शाकाहार से शक्ति उत्पन्न होती है और मांस खाने से उत्तेजना बढ़ती है।’’ 
यही कारण है कि समस्त धर्मग्रंथों ने एक स्वर से मांसाहार का  निशेध  किया है और इस बुराई पर अड़े रहने वालों को कटु शब्दों में धिक्कारा है। हिंदू धर्मग्रंथों के अतिरिक्त बाइबिल, कुरआन आदि सभी धर्मग्रंथों ने मांसाहार को हेय ठहराया है और निरीह प्रजातियों की हत्या को घोर दंडनीय अपराध कहा है।’’ उक्त  शब्द एक वैज्ञानिक मनीशी और डॉक्टर के हैं। जिन लोगों ने हिंदू “शास्त्रों के अलावा बाइबिल और कुरआन का भी अध्ययन किया है वे लोग बखूबी अंदाजा लगा सकते हैं कि उक्त मनीशी को “शास्त्रों का कितना ज्ञान था। उक्त मनीशी की शास्त्रों  के प्रति अनभिज्ञता तो स्पष्‍ट हो ही रही है, यह वैज्ञानिक विज्ञान के तथ्यों और सत्यों से भी कतई अनभिज्ञ था।

पत्रिका में आगे विश्‍वविख्यात दार्शनिक पैथागोरस के शब्दों में इस प्रकार लिखा है -
‘‘ऐ मौत के फंदे में उलझे हुए इंसान ! अपनी तश्‍तरियों को मांस से सजाने के लिए जीवों की हत्या करना छोड़ दे। जो व्यक्ति भोले-भाले प्राणियों की गरदन पर छुरी चलवाता है, उनका करुण क्रंदन सुनता है, जो अपने हाथों पाले हुए पशु-पक्षियों की हत्या करके अपनी मौज मनाता है, उसे अत्यंत तुच्छ स्तर का व्यक्ति समझना चाहिए। जो पशुओं का मांस खा सकता है, वह किसी दिन मनुष्‍यों का भी खून पी सकता है।’’

योग गुरु रामदेव ने अपने योग षिविर को संबोधित करते हुए कहा कि अगर कोई मुझसे कहे कि एक अंडा खा लो, हम तुम्हें सारी दुनिया का मालिक बना देंगे, तो मैं फिर भी अंडा खाना पसंद नहीं करूंगा। लोग कहते हैं कि अंडे में प्रोटीन होता है, मैं कहता हूँ कि अंडे में प्रोटीन नहीं बल्कि पौट्टी (स्ंजतपदम) होती है।’’
पाठक अंदाजा लगा सकते हैं कि योग गुरु रामदेव की धारणा कितनी वैज्ञानिक और तर्कसंगत है। यहाँ यह भी विचारणीय है कि गुरु रामदेव जी गाय के मूत्र को रोगनाषक औषधि बताते हैं।

अखंड ज्योति में शास्त्रों के नाम से कहा गया है कि ‘अन्न अर्थात् आहार के अनुसार ही मन बनता है। यह उक्ति जो कही गयी है उचित प्रतीत होती है। मगर मांसाहार से जोड़कर जो इसकी व्याख्या की गयी है वह कतई असंगत है। इसमें मांसाहार का कही निषेध या विरोध नहीं है। इस उक्ति का मतलब तो यह है कि जो आहार हम खाये, वह शुद्ध, सात्विक और स्वच्छ होना चाहिए। वह मेहनत और ईमानदारी से कमाया हुआ होना चाहिए, न कि लूट खसोट, छीना झपटी, धोखाधड़ी, रिष्वत और ब्याज आदि का। हमारी इस नेक और खून-पसीने की कमाई में गरीब, असहाय, बीमार आदि का भी हिस्सा होना चाहिए। अगर हम चोरी का, लूट-खसोट का, बेईमानी का अन्न खायेंगे तो उसका प्रभाव अवश्‍य हमारे मन मस्तिष्‍क पर पड़ेगा। लेख में जो कहा गया है कि मांस खाने से मनुष्‍य  के अन्दर बर्बरता और क्रूरता बढ़ती है, यह तथ्य बिल्कुल अतार्किक और अव्यावहारिक है। प्रायः देखने में आता है कि हिंदू समाज में मांसाहार का विरोध पाया जाता है, मगर इस समाज में भ्रूण हत्या की दर अन्य कौमों से कम नहीं है। इससे अधिक क्रूरता और बर्बरता की बात और क्या होगी कि एक औरत अपने पेट के बच्चे तक को पैसे देकर कत्ल (।इवतजपवद) करा रही है। क्या यह क्रूरता मांसाहार से उत्पन्न प्रवृत्ति की देन है ?

31 अक्टूबर सन् 1984 को भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की अपने ही सिख अंगरक्षकों द्वारा हत्या कर दी गई। इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद पूरी सिख कौम को दोषी  मानते हुए लगभग 4000 सिखों को बेदर्दी से कत्ल किया गया। पूरे के पूरे परिवारों को जिंदा जला दिया गया। यहां सवाल यह पैदा होता है कि क्या यह सब करने वाले मांसाहारी थे ?

2002 में गोधरा कांड के बाद गुजरात में मुसलमानों पर जो जुल्म हुआ, वहां जो बर्बरता और क्रूरता का नंगा नाच हुआ, क्या वे सब करने वाले मांसाहारी थे ?

कुछ हिंदू विद्वान और गुरु यह भी प्रचारित कर रहे हैं कि ‘‘ग्लोबल वार्मिंग का एक कारण मांसभक्षण भी है।’’ यह तथ्य भी विज्ञान और प्रकृति के बिल्कुल विपरीत है। वास्तविकता तो यह है कि  स्रष्‍टा  ने प्राकृतिक संतुलन के लिए एक जीव को दूसरे जीव पर निर्भर बनाया है। मांसभक्षण प्रकृति की एक अनिवार्य क्रिया है। भोजन को मांसाहार और शाकाहार दो हिस्सों में बांटना एक धोखा है, अंधविश्‍वास है। आज विज्ञान के युग में, जबकि हमें प्रत्येक जीव और वनस्पति की हिस्ट्री और कैमिस्ट्री मालूम है, फिर भी आज हमारे तथाकथित गुरु अपने धर्मशास्त्रों, वैज्ञानिक सत्यों और प्राकृतिक व्यवस्था का विरोध न जाने क्यों कर रहे हैं ?

आज हम सम्पूर्ण वनस्पति जगत, प्राणि जगत और विशाल समुंद्री जगत की वास्तविकता घर बैठे देख रहे हैं इसलिए यह बात आसानी से समझ सकते हैं कि अगर विश्‍व में मांसाहार पर 100 प्रतिशत प्रतिबंध लगा दिया जाए तो क्या हम 700 करोड़ लोगों की आहार पूर्ति केवल अनाज से कर पायेंगे ?

हमारी सम्पूर्ण पृथ्वी का 30 प्रतिशत थल और लगभग 70 प्रतिशत समुंद्र है। 30 प्रतिशत  थल में भी पहाड़ है, रेगिस्तान है, वन खंड है, बंजर है, नदी-नाले हैं, आवास हैं, जो कृषि योग्य भूमि है वह अत्यंत ही कम है। इस कृषि योग्य भूमि से मानव जाति की आहार पूर्ति संभव नहीं है फिर आख़िर यह बात हमारी समझ में क्यों नहीं आती कि मांस भक्षण मानव जाति की आहार पूर्ति के लिए अपरिहार्य है। इसका हमारे पास अन्य कोई विकल्प नहीं है। अगर मांस भक्षण पर प्रतिबंध लगा दिया जाए तो अंदाजा लगाइए कि एक रोटी की कीमत क्या होगी ?

मांस एक प्राकृतिक आहार है। मांस भक्षण का विरोध करना प्राकृतिक व्यवस्था के ख़िलाफ है। शाकाहारवाद एक अप्राकृतिक धारणा है, इसे कभी पूर्णतया लागू ही नहीं किया जा सकता। आने वाले समय में तो कुछ ऐसा लगता है कि मनुष्‍य  की आहार पूर्ति केवल समुंद्र (ैमं थ्ववक) से होगी और सच भी यही है कि अति विशाल समुंद्र ही हमारी आहार पूर्ति का मूल स्रोत है। जो शाकाहारवादी ;म्गजतमउपेज टमहमजंतपंदपेउद्ध मांसाहार का पुरज़ोर विरोध कर रहे हैं, उन्हें अपनी रुढ़िवादी और मिथ्या धारणा पर पुनर्विचार करना चाहिए। प्राकृतिक सत्यों को झुठलाना स्वयं को अज्ञानी और अंधविश्‍वासी साबित करना है।

यहां मेरा उद्देश्‍य मांसाहार को प्रोत्साहित करना हरगिज़ नहीं है, जो खाना है खाये। यह समाज, राष्‍ट्र और विश्‍व की कोई ज्वलंत समस्या नहीं है। यहां मेरा उद्देश्‍य मात्र इतना है कि हम कोई ऐसा भ्रामक प्रचार न करें जिसका हमारे समाज पर निकट भविष्‍य  में बुरा और प्रतिकूल प्रभाव पड़े।

Arya Samaj - अहिंसा परमो धर्मः ? Satish chand Gupta

‘योग सूत्र’ के प्रणेता महर्षि पतंजलि ने योग के आठ अंगों का वर्णन किया है। योग का पहला अंग ‘यम’ है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह इन पाँच को योग दर्शन में ‘यम’ कहा गया है।
‘अहिंसा सत्या स्तेय ब्रह्मचर्या परिग्रहा यमाः। (योग दर्शन, 2-30)


जैन मत में उक्त पाँचों को व्रत कहा गया है। अहिंसा जैन मत का मुख्य तत्व है। यहाँ अहिंसा का मतलब किसी प्राणी को बिना किसी उद्देश्य के नुकसान न पहुंचाना है। निष्प्रयोजन किसी प्राणी की हत्या करना या चोट पहुंचाना यहाँ तक कि क्लेश पहुंचाना एवं आत्मभाव पर आघात करना हिंसा है। निष्प्रयोजन किसी पेड़ की टहनियाँ तोड़ना भी हिंसा के अन्तर्गत आता है। मगर कुछ पंथों के प्रणेताओं ने हिंसा की मनमानी व्याख्या की है। ‘‘अहिंसा परमो धर्मः’ का नारा देने वालों का कहना है कि किसी भी प्रकार की हिंसा पाप है चाहे वह प्रयोजनीय हो या निष्प्रयोजनीय। उक्त नारे का मूल निहितार्थ मांस भक्षण को निषिद्ध व पाप ठहराना था। जैन धर्म के प्रवर्तक महावीर स्वामी के बाद महात्मा बुद्ध ने भी अहिंसा का उपदेश दिया।

गौतम बुद्ध का जन्म एक क्षत्रिय परिवार में 563 ई0पू0 लुम्बिनी नामक स्थान पर हुआ था। लुम्बिनी कपिलवस्तु के पड़ोस में है। इनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था। सिद्धार्थ श्रेष्ठतर जीवन मूल्यों की तलाश में 29 वर्ष की आयु में घर से निकल गए। 6 वर्ष तक सच्चाई की तलाश में भटकते हुए एक दिन उन्हें बुद्धत्व प्राप्त हुआ और वे सिद्धार्थ से गौतम बुद्ध बन गए। गौतम बुद्ध के बाद भारतीय चिंतन में एक तूफ़ान-सा आ गया था, क्योंकि गौतम बुद्ध का सीधा टकराव वैदिक ब्राह्मणों से था।


वैदिक ब्राह्मण यज्ञ को प्रथम और उत्तम वैदिक संस्कार समझते थे। यह आर्यों का मुख्य धार्मिक कृत्य था। पशु बलि यज्ञ का मुख्य अंग थी। पशु बलि को बहुत ही पुण्य का कर्तव्य समझा जाता था। गौतम बुद्ध ने जब देखा कि आर्य लोग यज्ञ में निरीह पशुओं की बलि चढ़ाते हैं, तो यह देखकर उनका हृदय विद्रोह से भर उठा। आर्य धर्म के विरूद्ध उठने वाली क्रांति का प्रमुख कारण वैदिक पुरोहितवाद और हिंसा पूर्ण कर्मकांड ही था। 
 ईसा से करीब 500 वर्ष पहले गौतम बुद्ध ने वैदिक धर्म पर जो सबसे बड़ा आरोप लगाया था वह यह था कि, 
‘‘पशु बलि का पुण्य कार्य और पापों के प्रायश्चित से क्या संबंध ? पशु बलि धर्माचरण नहीं जघन्य पाप व अपराध है ?’’
यह एक विडंबना ही है कि गौतम बुद्ध के करीब 2350 वर्ष बाद आर्य समाज के संस्थापक, वेदों के प्रकांड पंडित स्वामी दयानंद सरस्वती ने इस्लाम पर जो सबसे बड़ा आरोप लगाया है वह यह है कि 
‘‘यदि अल्लाह प्राणी मात्र के लिए दया रखता है तो पशु बलि का विधान क्यों कर धर्म-सम्मत हो सकता है ? पशु बलि धर्माचरण नहीं जघन्य पाप व अपराध है।’’ 
कैसी अजीब विडंबना है कि जो सवाल गौतम बुद्ध ने वैदिक ऋषियों से किया था, वही सवाल करीब 2350 वर्ष बाद एक वैदिक महर्षि मुसलमानों से करता है। जो आरोप गौतम बुद्ध ने आर्य धर्म पर लगाया था, वही आरोप कई ‘शताब्दियों बाद एक आर्य विद्वान इस्लाम पर लगाता है।

धर्म का संपादन मनुष्य द्वारा नहीं होता। धर्म सृष्टिकर्ता का विधान होता है। धर्म का मूल स्रोत आदमी नहीं, यह अति प्राकृतिक सत्ता है। यह भी विडंबना ही है कि गौतम बुद्ध ने ईश्वर के अस्तित्व का इंकार करके वैदिक धर्म को आरोपित किया था, मगर स्वामी दयानंद सरस्वती ने ईश्वर के अस्तित्व का इकरार करके इस्लाम को आरोपित किया है। 

प्राचीन भारतीय समाज में पशु बलि के साथ-साथ नर बलि की भी एक सामान्य प्रक्रिया थी। यज्ञ-याग का समर्थन करने वाले वैदिक ग्रंथ इस बात के साक्षी हैं कि न केवल पशु बलि बल्कि नर बलि की प्रथा भी एक ठोस इतिहास का परिच्छेद है। यज्ञों में आदमियों, घोड़ों, बैलों, मेंढ़ों और बकरियों की बलि दी जाती थी। रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी मुख्य पुस्तक ‘‘संस्कृति के चार अध्याय’’ में लिखा है कि यज्ञ का सार पहले मनुष्य में था, फिर वह अश्व में चला गया, फिर गो में, फिर भेड़ में, फिर अजा में, इसके बाद यज्ञ में प्रतीकात्मक रूप में नारियल-चावल, जौ आदि का प्रयोग होने लगा। आज भी हिंदुओं के कुछ संप्रदाय पशु बलि में विश्वास रखते हैं। 


वेदों के बाद अगर हम रामायण काल की बात करें तो यह तथ्य निर्विवाद रूप से सत्य है कि श्री राम शिकार खेलते थे। जब रावण द्वारा सीता का हरण किया गया, उस समय श्री राम हिरन का शिकार खेलने गए हुए थे। उक्त तथ्य के साथ इस तथ्य में भी कोई विवाद नहीं है कि श्रीमद्भागवतगीता के उपदेशक श्री कृष्ण की मृत्यु शिकार खेलते हुए हुई थी। यहाँ यह सवाल पैदा होता है कि क्या उक्त दोनों महापुरुष हिंसा की परिभाषा नहीं जानते थे ? क्या उनकी धारणाओं में जीव हत्या जघन्य पाप व अपराध नहीं थी ? क्या शिकार खेलना उनका मन बहलावा मात्र था ?

अगर हम उक्त सवाल पर विचार करते हुए यह मान लें कि पशु बलि और मांस भक्षण का विधान धर्मसम्मत नहीं हो सकता, क्योंकि ईश्‍वर अत्यंत दयालु और कृपालु है, तो फिर यहाँ यह सवाल भी पैदा हो जाता है कि जानवर, पशु, पक्षी आदि जीव हत्या और मांस भक्षण क्यों करते हैं। अगर अल्लाह की दयालुता का प्रमाण यही है कि वह जीव हत्या और मांस भक्षण की इजाजत कभी नहीं दे सकता तो फिर शेर, बगुला, चमगादड़, छिपकली, मकड़ी, चींटी आदि जीवहत्या कर मांस क्यों खाते हैं ? क्या शेर, चमगादड़ आदि ईश्वर की रचना नहीं है ?


शेर को जंगल का राजा कहा जाता है, वह जानवरों पर इतनी बेदर्दी और बेरहमी से हमला करता है कि जानवर दहाड़ मारने लगता है। मांसाहारी चमगादड़ों की एक बस्ती में लगभग 2 करोड़ तक चमगादड़ें होती हैं। अगर चमगादड़ की एक बस्ती के एक रात के भोजन का अनुमान लगाये तो 2 करोड़ की एक बस्ती एक रात में करीब 2500 कुंतल कीड़ों, कीटों आदि को चट कर जाती हैं। अगर इन कीड़ों, कीटों की तादाद का अनुमान लगाया जाए तो यह तादाद करीब 1000 करोड़ से अधिक होती है। यह तो एक मामूली-सा उदाहरण मात्र है, यह दुनिया बहुत बड़ी है और इस जमीनी दुनिया से कहीं अधिक विस्तृत और विशाल तो समुद्री दुनिया है जहाँ एक जीव पूर्ण रूप से दूसरे जीव पर निर्भर है।

विश्व के मांस संबंधी आंकड़ों पर अगर हम एक सरसरी नज़र डालें तो आंकड़े बताते हैं कि प्रतिदिन 8 करोड़ मुर्गियां, 22 लाख सुअर, 13 लाख भेड़-बकरियां, 7 लाख गाय, करोड़ों मछलियां और अन्य पशु-पक्षी मनुष्य का लुकमा बन जाते हैं। कई देश तो ऐसे हैं जो पूर्ण रूप से मांस पर ही निर्भर हैं। अब अगर मांस भक्षण को पाप व अपराध मान लिया जाए तो न केवल मनुष्य का जीवन बल्कि सृष्टि का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। जीव-हत्या को पाप मानकर तो हम खेती-बाड़ी का काम भी नहीं कर सकते, क्योंकि खेत जोतने और काटने में तो बहुत अधिक जीव-हत्या होती है।


विज्ञान के अनुसार पशु-पक्षियों की भांति पेड़-पौधों में भी जीवन Life है। अब जो लोग मांस भक्षण को पाप समझते हैं, क्या उनको इतनी-सी बात समझ में नहीं आती कि जब पेड़-पौधों में भी जीवन है तो फिर उनका भक्षण जीव-हत्या क्यों नहीं है? फिर मांस खाने और वनस्पति खाने में अंतर ही क्या है ? यहाँ अगर जीवन Life ; और जीव Soul; में भेद न माना जाए तो फिर मनुष्य भी पशु-पक्षी और पेड़-पौधों की श्रेणी में आ जाता है। जीव केवल मनुष्य में है इसलिए ही वह अन्यों से भिन्न और उत्तम है।

विज्ञान के अनुसार मनुष्य के एक बार के वीर्य Male generation fluid स्राव (Discharge) में 2 करोड़ ‘शुक्राणुओं (Sperm) की हत्या होती है। मनुष्य जीवन में एक बार नहीं, बल्कि सैकड़ों बार वीर्य स्राव करता है। फिर मनुष्य भी एक नहीं करोड़ों हैं। अब अगर यह मान लिया जाए कि प्रत्येक ‘शुक्राणु (Sperm) एक जीव है, तो इससे बड़ी तादाद में जीव हत्या और कहां हो सकती है ? करोड़ों-अरबों जीव-हत्या करके एक बच्चा पैदा होता है। अब क्या जीव-हत्या और ‘‘अहिंसा परमों धर्मः’’ की धारणा तार्किक और विज्ञान सम्मत हो सकती है।


 जहाँ-जहाँ जीवन है वहाँ-वहाँ जीव (Soul) हो यह ज़रूरी नहीं। वृद्धि- ह्रास , विकास जीवन (Life) के लक्षण हैं जीव के नहीं। आत्मा वहीं है जहाँ कर्म भोग है और कर्म भोग वही हैं जहाँ विवेक (Wisdom) है। पशु आदि में विवेक नहीं है, अतः वहां आत्मा नहीं है। आत्मा नहीं है तो कर्म फल भोग भी नहीं है। आत्मा एक व्यक्तिगत अस्तित्व (Cosmic Existence) है जबकि जीवन एक विश्वगत अस्तित्व (Individual Existence) है। पशु और वनस्पतियों में कोई व्यक्तिगत अस्तित्व नहीं होता। अतः उसकी हत्या को जीव हत्या नहीं कहा जा सकता। जब पशु आदि में जीव (Soul) ही नहीं है, तो जीव-हत्या कैसी ? पशु आदि में सिर्फ और सिर्फ जीवन है, जीव नहीं। अतः पशु-पक्षी आदि के प्रयोजन हेतु उपयोग को हिंसा नहीं कहा जा सकता।

प्रश्नः पशुओं को मारना एक क्रूरतापूर्ण कृत्य है तो फिर मुसलमान मांसाहारी भोजन क्यों पसन्द करते हैं? zakir naik ka jawab

प्रश्नः पशुओं को मारना एक क्रूरतापूर्ण कृत्य है तो फिर मुसलमान मांसाहारी भोजन क्यों पसन्द करते हैं?
उत्तरः ‘शाकाहार’ आज एक अंतराष्ट्रीय आन्दोलन बन चुका है बल्कि अब तो पशु-पक्षियों के अधिकार भी निर्धारित कर दिये गए हैं। नौबत यहां तक पहुंची है कि बहुत से लोग मांस अथवा अन्य प्रकार के सामिष भोजन को भी पशु-पक्षियों के अधिकारों का हनन मानने लगे हैं।
इस्लाम केवल इंसानों पर ही नहीं बल्कि तमाम पशुओं और 
प्राणधारियों पर दया करने का आदेश देता है परन्तु इसके साथ-साथ इस्लाम यह भी कहता है कि अल्लाह तआला ने यह धरती और इस पर मौजूद सुन्दर पौधे और पशु पक्षी, समस्त वस्तुएं मानवजाति के फ़ायदे के लिए उत्पन्न कीं। यह मनुष्य की ज़िम्मेदारी है कि वह इन समस्त 
संसाधनों को अल्लाह की नेमत और अमानत समझकर, न्याय के साथ इनका उपयोग करे।
अब हम इस तर्क के विभिन्न पहलुओं पर दृष्टि डालते हैं।
मुसलमान पक्का ‘शाकाहारी’ बन सकता है
एक मुसलमान पुरी तरह शाकाहारी रहकर भी एक अच्छा मुसलमान बन सकता है। मुसलमानों के लिए यह अनिवार्य नहीं है कि वह सदैव मांसाहारी भोजन ही करें।
पवित्र क़ुरआन मुसलमानों को मांसाहार की अनुमति देता है
पवित्र क़ुरआन में मुसलमानों को मांसाहारी भोजन की अनुमति दी गई है। इसका प्रमाण निम्नलिखित आयतों से स्पष्ट हैः
‘‘तुम्हारे लिए मवेशी (शाकाहारी पशु) प्रकार के समस्त जानवर हलाल किये गए हैं।’’ (पवित्र क़ुरआन , 5:1)
‘‘उसने पशु उत्पन्न किये जिनमें तुम्हारे लिए पोशाक भी है और ख़ूराक भी, और तरह तरह के दूसरे फ़ायदे भी।’’ (पवित्र क़ुरआन , 16:5)
‘‘और हकीकत यह है कि तुम्हारे लिये दुधारू पशुओं में भी एक शिक्षा है, उनके पेटों में जो कुछ है उसी में से एक चीज़ (अर्थात दुग्ध) हम तुम्हें पिलाते हैं और तुम्हारे लिए इनमे बहुत से दूसरे फ़ायदे भी हैं, इनको तुम खाते हो और इन पर और नौकाओं पर सवार भी किये जाते हो।’’ (पवित्र क़ुरआन , 23:21)
मांस पौष्टिकता और प्रोटीन से भरपूर होता है
मांसाहारी भोजन प्रोटीन प्राप्त करने का अच्छा साधन है। इसमें भरपूर प्रोटीन होते है। अर्थात आठों जीवन पोषक तत्व। (इम्यूनो एसिड) मौजूद होते हैं। यह आवश्यक तत्व मानव शरीर में नहीं बनते। अतः इनकी पूर्ती बाहरी आहार से करना आवश्यक होता है। इसके अतिरिक्त माँस में लोहा, विटामिन-बी, इत्यादि पोषक तत्व भी पाए जाते हैं।
मानवदंत प्रत्येक प्रकार के भोजन के लिए उपयुक्त हैं
यदि आप शाकाहारी पशुओं जैसे गाय, बकरी अथवा भेड़ आदि के दांतों को देखें तो आश्चर्यजनक समानता मिलेगी। इन सभी पशुओं के दाँत 
सीधे अथवा फ़्लैट हैं। अर्थात ऐसे दांत जो वनस्पति आहार चबाने के लिए उपयुक्त हैं। इसी प्रकार यदि आप शेर, तेंदुए अथवा चीते इत्यादि के दांतों का निरीक्षण करें तो आपको उन सभी में भी समानता मिलेगी। मांसाहारी जानवारों के दांत नोकीले होते हैं। जो माँस जैसा आहार चबाने के लिए उपयुक्त हैं। परनतु मनुष्य के दाँतों को ध्यानपुर्वक देखें तो पाएंगे कि उनमें से कुछ दांत सपाट या फ़्लैट हैं परन्तु कुछ नोकदार भी हैं। इसका मतलब है कि मनुष्य के दांत शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार के आहार के लिए उपयुक्त हैं। अर्थात मनुष्य सर्वभक्षी प्राणी है जो वनास्पति और माँस प्रत्येक प्रकार का आहार कर सकता है।
प्रश्न किया जा सकता है कि यदि अल्लाह चाहता कि मनुष्य केवल शाकाहारी रहे तो उसमें हमें अतिरिक्त नोकदार दांत क्यों दिये? इसका तार्किक उत्तर यही है कि अल्लाह ने मनुष्य को सर्वभक्षी प्राणी के रूप में रचा है और वह महान विधाता हमसे अपेक्षा रखता है कि हम शाक सब्ज़ी के अतिरिक्त सामिष आहार (मांस, मछली, अण्डा इत्यादि) से भी अपनी शारीरिक आवश्यकताएं पूरी कर सकें।
मनुष्य की पाचन व्यवस्था शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार के भोजन को पचा सकती है
शाकाहारी प्राणीयों की पाचन व्यवस्था केवल शाकाहारी भोजन को पचा सकती है। मांसाहारी जानवरों में केवल मांस को ही पचाने की क्षमता होती है। परन्तु मनुष्य हर प्रकार के खाद्य पद्रार्थों को पचा सकता है। यदि अल्लाह चाहता कि मनुष्य एक ही प्रकार के आहार पर जीवत रहे तो हमारे शरीर को दोनों प्रकार के भोजन के योग्य क्यों बनाता कि वह शक सब्ज़ी के साथ-साथ अन्य प्रकार के भोजन को भी पचा सके।
पवित्र हिन्दू धर्मशास्त्रों में भी 
मांसाहारी भोजन की अनुमति है
(क) बहुत से हिन्दू ऐसे भी हैं जो पूर्ण रूप से शाकाहारी हैं। उनका विचार है कि मास-मच्छी खाना उनके धर्म के विरुद्ध है परन्तु यह वास्तविकता है कि हिन्दुओं के प्राचीन धर्मग्रन्थों में मांसाहार पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है। उन्हीं ग्रंथों में ऐसे साधू संतों का उल्लेख है जो मांसाहारी थे।
(ख) मनुस्मृति जो हिन्दू कानून व्यवस्था का संग्रह है, उसके पाँचवे 
अध्याय के 30वें श्लोक में लिखा हैः
‘‘खाने वाला जो उनका मांस खाए कि जो खाने के लिए है तो वह कुछ बुरा नहीं करता, चाहे नितदिन वह ऐसा क्यों न करे क्योंकि ईश्वर ने स्वयं ही बनाया है कुछ को ऐसा कि खाए जाएं और कुछ को ऐसा कि खाएं।’’
(ग) मनुस्मृति के पाँचवें अध्याय के अगले श्लोक नॉ 31 में लिखा हैः
‘‘बलि का माँस खाना उचित है, यह एक रीति है जिसे देवताओं का आदेश जाना जाता है ’’
(घ) मनुस्मृति के इसी पाँचवें अध्याय के श्लोक 39-40 में कहा गया हैः
‘‘ईश्वर ने स्वयं ही बनाया है बलि के पशुओं को बलि हेतु। तो बलि के लिये मारना कोई हत्या नहीं है।’’
(ङ) महाभारत, अनुशासन पर्व के 58वें अध्याय के श्लोक 40 में धर्मराज युधिष्ठिर और भीष्म पितामहः के मध्य इस संवाद पर कि यदि कोई व्यक्ति अपने पुरखों के श्राद्ध में उनकी आत्मा की शांति के लिए कोई भोजन अर्पित करना चाहे तो वह क्या कर सकता है। वह वर्णन इस प्रकार हैः
‘‘युधिष्ठिर ने कहाµ ‘हे महाशक्तिमान, मुझे बताओ कि वह कौन सी वस्तु है जिसे यदि अपने पुरखों की आत्मा की शांति के लिए अर्पित करूं तो वह कभी समाप्त न हो, वह क्या वस्तु है जो (यदि दी जाए तो) सदैव बनी रहे? वह क्या है जो (यदि भेंट की जाए तो) अमर हो जाए?’’
भीष्म ने कहाः ‘‘हे युधिष्ठिर! मेरी बात ध्यानपुर्वक सुनो, वह भेंटें क्या हैं जो कोई श्रद्धापूर्वक अर्पित की जाए जो श्रद्धा हेतु अचित हो और वह क्या फल है जो प्रत्येक के साथ जोड़े जाएं। तिल और चावल, जौ और उड़द और जल एवं कन्दमूल आदि उनकी भेंट किया जाए तो हे राजन! तुम्हारे पुरखों की आत्माएं प्रसन्न होंगी। भेड़ का (मांस) चार मास तक, ख़रगोश के (मांस) की भेंट चार मास तक प्रसन्न रखेगी, बकरी के (मांस) की भेंट छः मास तक और पक्षियों के (मांस) की भेंट सात मास तक प्रसन्न रखेगी। मृग के (मांस) की भेंट दस मास तक, भैंसे के (मांस) का दान ग्यारह मास तक प्रसन्न रखेगा। कहा जाता है कि गोमांस की भेंट एक वर्ष तक शेष रहती है। भेंट के गोमांस में इतना घृत मिलाया जाए जो तुम्हारे पुरखों की आत्माओं को स्वीकार्य हो, धरनासा (बड़ा बैल) का मांस तुम्हारे पुरखों की आत्माओं को बारह वर्षों तक प्रसन्न रखेगा। गेण्डे का मांस, जिसे पुरखों की आत्माओं को चन्द्रमा की उन रातों में भेंट किया जाए जब वे परलोक सिधारे थे तो वह उन्हें सदैव प्रसन्न रखेगा। और एक जड़ी बूटी कलासुका कही जाती है तथा कंचन पुष्प की पत्तियाँ और (लाल) बकरी का मांस भी, जो भेंट किया जाए, वह सदैव-सदैव के लिये है। यदि तुम चाहते हो कि तुम्हारें पितरों की आत्मा सदैव के लिए शांति प्राप्त करे तो तुम्हें चाहिए कि लाल बकरी के मांस से उनकी सेवा करो।’’ (भावार्थ)
हिन्दू धर्म भी अन्य धर्मों से प्रभावित हुआ है
यद्यपि हिन्दू धर्म शास्त्रों में मांसाहारी भोजन की अनुमति नहीं है परन्तु हिन्दुओं के अनुयायियों ने कालांतर में अन्य धर्मों का प्रभाव भी स्वीकार किया और शाकाहार को आत्मसात कर लिया। इन अन्य धर्मों में जैनमत इत्यादि शामिल हैं।
पौधे भी जीवनधारी हैं
कुछ धर्मों ने शकाहार पर निर्भर रहना इसलिए भी अपनाया है क्योंकि आहार व्यवस्था में जीवित प्राणधारियों को मारना वार्जित है। यदि कोई व्यक्ति अन्य प्राणियों को मारे बिना जीवित रह सकता है तो वह पहला व्यक्ति होगा जो जीवन बिताने का यह मार्ग स्वीकार कर लेगा। अतीत में लोग यह समझते थे कि वृक्ष-पौधे निष्प्राण होते हैं परन्तु आज यह एक प्रामाणिक तथ्य है कि वृक्ष-पौधे भी जीवधारी होते हैं अतः उन लोगों की यह धारणा कि प्राणियों को मारकर खाना पाप है, आज के युग में 
निराधार सिद्ध होती है। अब चाहे वे शाकाहारी क्यों न बने रहें।
पौधे भी पीड़ा का आभास कर सकते हैं
पूर्ण शाकाहार में विश्वास रखने वालों की मान्यता है कि पौधे कष्ट और पीड़ा महसूस नहीं कर सकते अतः वनस्पति और पेड़-पौधों को मारना किसी प्राणी को मारने के अपेक्षा बहुत छोटा अपराध है। आज विज्ञान हमें बताता है कि पौधे भी कष्ट और पीड़ा का अनुभव करते हैं किन्तु उनके रुदन और चीत्कार को सुनना मनुष्य के वश में नहीं। इस का कारण यह है कि मनुष्य की श्रवण क्षमता केवल 20 हटर्ज़ से लेकर 20,000 हर्टज फ्ऱीक्वेंसी वाली स्वर लहरियाँ सुन सकती हैं। एक कुत्ता 40,000 हर्टज तक की लहरों को सुन सकता है। यही कारण है कि कुत्तों के लिए विशेष सीटी बनाई जाती है तो उसकी आवाज़ मनुष्यों को सुनाई नहीं देती परन्तु कुत्ते उसकी आवाज़ सुनकर दौड़े आते हैं, उस सीटी की आवाज़ 20,000 हर्टज से अधिक होती है।
एक अमरीकी किसान ने पौधों पर अनुसंधान किया। उसने एक ऐसा यंत्र बनाया जो पौधे की चीख़ को परिवर्तित करके फ्ऱीक्वेंसी की 
परिधि में लाता था कि मनुष्य भी उसे सुन सकें। उसे जल्दी ही पता चल गया कि पौधा कब पानी के लिए रोता है। आधुनिकतम अनुसंधान से सिद्ध होता है कि पेड़-पौधे ख़ुशी और दुख तक को महसूस कर सकते हैं और वे रोते भी हैं।

(अनुवादक के दायित्व को समक्ष रखते हुए यह उल्लेख हिन्दी में भी किया गया है। दरअस्ल पौधे के रोने चीख़ने की बात किसी अनुसंधान की चर्चा किसी अमरीकी अख़बार द्वारा गढ़ी गई है। क्योंकि गम्भीर विज्ञान साहित्य और अनुसंघान सामग्री से पता चला है कि प्रतिकूल परिस्थतियों अथवा पर्यावरण के दबाव की प्रतिक्रिया में पौधों से विशेष प्रकार का रसायनिक द्रव्य निकलता है। वनस्पति वैज्ञानिक इस प्रकार के रसायनिक द्रव्य को ‘‘पौधे का रुदन और चीत्कार बताते हैं) अनुवादक
दो अनुभूतियों वाले प्राणियों की हत्या करना 

निम्नस्तर का अपराध है
एक बार एक शाकाहारी ने बहस के दौरान यह तर्क रखा कि पौधों में दो अथवा तीन अनुभूतियाँ होती हैं। जबकि जानवरों की पाँच अनुभूतियाँ होती है। अतः (कम अनुभव क्षमता के कारण) पौधों को मारना जीवित जानवरों को मारने की अपेक्षा छोटा अपराध है। इस जगह यह कहना पड़ता है कि मान लीजिए (ख़ुदा न करे) आपका कोई भाई ऐसा हो जो जन्मजात मूक और बधिर हो अर्थात उसमें अनुभव शक्ति कम हो, वह वयस्क हो जाए और कोई उसकी हत्या कर दे तब क्या आप जज से कहेंगे कि हत्यारा थोड़े दण्ड का अधिकारी है। आपके भाई के हत्यारे ने छोटा अपराध किया है और इसीलिए वह छोटी सज़ा का अधिकारी है? केवल इसलिए कि आपके भाई में जन्मजात दो अनुभूतियाँ कम थीं? इसके बजाए आप यही कहेंगे कि हत्यारे ने एक निर्दोष की हत्या की है अतः उसे कड़ी से कड़ी सज़ा दी जाए।
पवित्र क़ुरआन में फ़रमाया गया हैः
‘‘लोगो! धरती पर जो पवित्र और वैध चीज़ें हैं, उन्हें खाओ और शैतान के बताए हुए रास्तों पर न चलो, वह तुम्हारा खुला दुश्मन है।’’ (पवित्र क़ुरआन , 2ः168)
पशुओं की अधिक संख्या
यदि इस संसार का प्रत्येक व्यक्ति शाकाहारी होता तो परिणाम यह होता कि पशुओं की संख्या सीमा से अधिक हो जाती क्योंकि पशुओं में उत्पत्ति और जन्म की प्रक्रिया तेज़ होती है। अल्लाह ने जो समस्त ज्ञान और बुद्धि का स्वामी है इन जीवों की संख्या को उचित नियंत्रण में रखने का मार्ग सुझाया है। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं कि अल्लाह तआला ने हमें (सब्ज़ियों के साथ साथ) पशुओं का माँस खाने की अनुमति भी दी है।
सभी लोग मांसाहारी नहीं, 
अतः माँस का मूल्य भी उचित है
मुझे इस पर कोई आपत्ति नहीं कि कुछ लोग पूर्ण रूप से शाकाहारी हैं परन्तु उन्हें चाहिए कि मांसाहारियों को क्रूर और अत्याचारी कहकर उनकी निन्दा न करें। वास्तव में यदि भारत के सभी लोग मांसाहारी बन जाएं तो वर्तमान मांसाहारियों का भारी नुकष्सान होगा क्योकि ऐसी स्थिति में माँस का मूल्य कषबू से बाहर हो जाएगा।

7
पशुओं को ज़िब्हा करने का इस्लामी तरीकष निदर्यतापूर्ण है
प्रश्नः मुसलमान पशुओं को ज़िब्ह (हलाल) करते समय निदर्यतापूर्ण ढंग क्यों अपनाते हैं? अर्थात उन्हें यातना देकर धीरे-धीरे मारने का तरीकष, इस पर बहुत लोग आपत्ति करते हैं?
उत्तरः निम्नलिखित तथ्यों से सिद्ध होता है कि ज़बीहा का इस्लामी तरीकष न केवल मानवीयता पर आधारित है वरन् यह साइंटीफ़िक रूप से भी श्रेष्ठ है।
जानवर हलाल कने का इस्लामी तरीकष
अरबी भाषा का शब्द ‘‘ज़क्कैतुम’’ जो क्रिया के रूप में प्रयोग किया जाता है उससे ही शब्द ‘‘ज़क़ात’’ निकलता है, जिसका अर्थ है ‘‘पवित्र करना।’’
जानवर को इस्लामी ढंग से ज़िब्हा करते समय निम्न शर्तों का पूर्ण 
ध्यान रखा जाना आवश्यक है।
(क) जानवर को तेज़ धार वाली छुरी से ज़िब्हा किया जाए। ताकि जानवर को ज़िब्हा होते समय कम से कम कष्ट हो।
(ख) ज़बीहा एक विशेष शब्द है जिस से आश्य है कि ग्रीवा और गर्दन की नाड़ियाँ काटी जाएं। इस प्रकार ज़िब्हा करने से जानवर रीढ़ की हड्डी काटेे बिना मर जाता है।
(ग) ख़ून को बहा दिया जाए।
जानवर के सिर को धड़ से अलग करने से पूर्व आवश्यक है कि उसका सारा ख़ून पूरी तरह बहा दिया गया हो। इस प्रकार सारा ख़ून निकाल देने का उद्देश्य यह है कि यदि ख़ून शरीर में रह गया तो यह कीटाणुओं के पनपने का माध्यम बनेगा। रीढ़ की हड्डी अभी बिल्कुल नहीं काटी जानी चाहिए क्योंकि उसमें वह धमनियाँ होती हैं जो दिल तक जाती हैं। इस समय यदि वह धमनियाँ कट गईं तो दिल की गति रुक सकती है और इसके कारण ख़ून का बहाव रुक जाएगा। जिससे ख़ून नाड़ियों में जमा रह सकता है।
कीटाणुओं और बैक्टीरिया के लिये 
ख़ून मुख्य माध्यम है
कीटाणुओं, बैक्टीरिया और विषाक्त तत्वों की उत्पति के लिये ख़ून एक सशक्त माध्यम है। अतः इस्लामी तरीके से ज़िब्हा करने से सारा ख़ून निकाल देना स्वास्थ्य के नियमों के अनुसार है क्योंकि उस ख़ून में कीटाणु और बैक्टीरिया तथा विषाक्त तत्व अधिकतम होते हैं।
मांस अधिक समय तक स्वच्छ और ताज़ा रहता है
इस्लामी तरीकष्े से हलाल किये गए जानवर का मांस अधिक समय तक स्वच्छ और ताज़ा तथा खाने योग्य रहता है क्योंकि दूसरे तरीकषें से काटे गए जानवर के मांस की अपेक्षा उसमें ख़ून की मात्रा बहुत कम होती है।
जानवर को कष्ट नहीं होता
ग्रीवा की नाड़ियाँ तेज़ी से काटने के कारण दिमाग़ को जाने वाली 
धमनियों तक ख़ून का प्रवाह रुक जाता है, जो पीड़ा का आभास उत्पन्न करती हैं। अतः जानवर को पीड़ा का आभास नहीं होता। याद रखिए कि हलाल किये जाते समय मरता हुआ कोई जानवर झटके नहीं लेता बल्कि उसमें तड़पने, फड़कने और थरथराने की स्थिति इसलिए होती है कि उसके पुट्ठों में ख़ून की कमी हो चुकी होती है और उनमें तनाव बहुत अधिक बढ़ता या घटता है।

8
मांसाहारी भोजन मुसलमानों को हिंसक बनाता है
प्रश्नः विज्ञान हमें बताता है कि मनुष्य जो कुछ खाता है उसका प्रभाव उसकी प्रवृत्ति पर अवश्य पड़ता है, तो फिर इस्लाम अपने अनुयायियों को सामिष आहार की अनुमति क्यों देता है? यद्यपि पशुओं का मांस खाने के कारण मनुष्य हिंसक और क्रूर बन सकता है?
उत्तरः केवल वनस्पति खाने वाले पशुओं को खाने की अनुमति है। मैं इस बात से सहमत हूँ कि मनुष्य जो कुछ खाता है उसका प्रभाव उसकी प्रवृत्ति पर अवश्य पड़ता है। यही कारण है कि इस्लाम में मांसाहारी पशुओं, जैसे शेर, चीता, तेंदुआ आदि का मांस खाना वार्जित है क्योंकि ये दानव हिंसक भी हैं। सम्भव है इन दरिन्दों का मांस हमें भी दानव बना देता। यही कारण है कि इस्लाम में केवल वनस्पति का आहार करने वाले पशुओं का मांस खाने की अनुमति दी गई हैं। जैसे गाय, भेड़, बकरी इत्यादि। यह वे पशु हैं जो शांति प्रिय और आज्ञाकारी प्रवृत्ति के हैं। मुसलमान शांति प्रिय और आज्ञाकारी पशुओं का मांस ही खाते हैं। अतः वे भी शांति प्रिय और अहिंसक होते हैं।
पवित्र क़ुरआन का फ़रमान है कि रसूल अल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) बुरी चीज़ों से रोकते हैं।
पवित्र क़ुरआन में फ़रमान हैः
‘‘वह उन्हें नेकी का हुक्म देता है, बदी से रोकता है, उनके लिए पाक चीज़ें हलाल और नापाक चीज़ें हराम करता है, उन पर से वह बोझ उतारता है जो उन पर लदे हुए थे। वह 
बंधन खोलता है जिनमें वे जकड़े हुए थे।’’ (पवित्र क़ुरआन , 7ः157)
एक अन्य आयत में कहा गया हैः
‘‘जो कुछ रसूल तुम्हें दे तो वह ले लो और जिस चीज़ें से तुम्हें रोक दे उसमें रुक जाओ, अल्लाह से डरो, अल्लाह सख़्त अज़ाब (कठोरतम दण्ड) देने वाला है।’’ (पवित्र क़ुरआन , 7ः159)
मुसलमानों के लिए महान पैग़म्बर का यह निर्देश ही उन्हे कषयल करने के लिए काफ़ी है कि अल्लाह तआला नहीं चाहता कि वह कुछ जानवरों का मांस खाएं जबकि कुछ का खा लिया करें।
इस्लाम की सम्पूर्ण शिक्षा पवित्र क़ुरआन और उसके बाद हदीस पर आधारित है। हदीस का आश्य है मुसलमानों के महान पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का कथन जो ‘सही बुख़ारी’, ‘मुस्लिम’, सुनन इब्ने माजह’, इत्यादि पुस्तकों में संग्रहीत हैं। और मुसलमानों का उन पर पूर्ण विश्वास है। प्रत्येक हदीस को उन महापुरूषों के संदर्भ से बयान कया गया है जिन्होंने स्वंय महान पैग़म्बर से वह बातें सुनी थीं।
पवित्र हदीसों में मांसाहारी जानवर 
का मांस खाने से रोका गया है
सही बुख़ारी, मुस्लिम शरीफ़ में मौजूद, अनेक प्रमाणिक हदीसों के अनुसार मांसाहारी पशु का मांस खाना वर्जित है। एक हदीस के अनुसार, जिसमें हज़रत इब्ने अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हु) के संदर्भ से बताया गया है कि हमारे पैग़म्बर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने (हदीस नॉ 4752), और सुनन इब्ने माजह के तेरहवें अध्याय (हदीस नॉ 3232 से 3234 तक) के अनुसार निम्नलिखित जानवरों का मांस खाने से मना किया हैः
1. वह पशु जिनके दांत नोकीले हों, अर्थात मांसाहारी जानवर, ये जानवर बिल्ली के परिवार से सम्बन्ध रखते हैं। जिसमें शेर, बबर शेर, चीता, बिल्लियाँ, कुत्ते, भेड़िये, गीदड़, लोमड़ी, लकड़बग्घे इत्यादि शामिल हैं।
2. कुतर कर खाने वाले जानवर जैसे छोटे चूहे, बड़े चूहे, पंजों वाले ख़रगोश इत्यादि।
3. रेंगने वाले कुछ जानवर जैसे साँप और मगरमच्छ इत्यादि।
4. शिकारी पक्षी, जिनके पंजे लम्बे और नोकदार नाख़ून हों (जैसे आम तौर से शिकारी पक्षियों के होते हैं) इनमें गरूड़, गिद्ध, कौए और उल्लू इत्यादि शामिल हैं।
ऐसा कोई वैज्ञानिक साक्ष्य नहीं है जो किसी सन्देह और संशय से ऊपर उठकर यह सिद्ध कर सके कि मांसाहारी अपने आहार के कारण हिसंक भी बन सकता है।